के एल सहगल – हिंदी सिने उद्योग का पहला सितारा

KL Saigal
KL Saigal / Image Courtesy UpperStall.com

आधुनिक पीढ़ी के लिए कुंदन लाल सहगल का नाम आते ही पुरानी फ़िल्मों के “अज़ीबो-ग़रीब” अंदाज़ में कहे जाने वाले संवादों तथा गायिकी की याद ताज़ा हो जाती है. मैंने उस ज़माने के फ़िल्मी संवाद व गायन के विषय में पहले भी कुछ लिखा था, तथा ये बताने की चेष्टा की थी कि आखिर वो क्या कारण रहे होंगे, कि जिनके चलते शुरुआती दौर के सिनेमाई तौर-तरीक़ों तथा बाद के फ़िल्मी अंदाज़ में एक बड़ा अंतर दिखाई देने लगा.

सहगल के विषय में मेरी जिज्ञासा भी उम्र के तीसरे दशक में ही प्रारंभ हुई, तथा उसकी एक ख़ास वजह बनी थी उम्र के साथ पैदा होने वाली मेरी संगीत के विषय में एक व्यापक समझ (और सही अर्थ में कहें तो जीवन के अन्य आयामों के विषय में भी), जिसकी कम आयु में संभावना बेहद कम ही हुआ करती है. एक और वज़ह थी किशोर कुमार तथा लता मंगेशकर के उन वक्तव्यों तथा साक्षात्कारों का ख़ुलासा होना, कि जिनका सोशल मीडिया के प्रगट होने से पहले पता लगा पाना बेहद कठिन था.

इस ऑनलाइन जानकारी के माध्यम से पहली बार पता चला, कि कैसे किशोर व लता सहगल को अपना आदर्श मानते हुए उनके गायन की अलग़-अलग़ मौक़ों पर तारीफ़ करते आए हैं. उदाहरण के तौर पर लता द्वारा किशोर का लिया गया ये वाला ख़ास इंटरव्यू, कि जिसमें दोनों ही सहगल को अपना आदर्श बताते हुए 0:40 मिनट पर देखे जा सकते हैं. इसके अतिरिक्त पार्श्वगायक मुकेश ने तो सहगल के कॉपीकैट के रूप में ही अपने प्रारंभिक प्लेबैक करियर की शुरुआत भी की थी, तथा ये सोशल मीडिया के आने से काफ़ी पहले से ही मैं फ़िल्मी गीतों के माध्यम से बख़ूबी जानता आया था. इन सभी बातों के परिप्रेक्ष्य में जब मैंने सहगल को पहली बार गंभीरता से सुनना प्रारंभ किया, तो उनकी आवाज की गहराई को सराहे बिना नहीं रह सका.

हम अगर उस ज़माने के फ़िल्मक्राफ़्ट तथा उससे जुड़ी तकनीकी सीमाओं का ख़याल रखते हुए सहगल के गीतों तथा उनके अभिनय की समीक्षा करना प्रारंभ करें, तो हमें आसानी से इस बात का आभास होने लगेगा, कि पुरानी पीढ़ी के फ़िल्म-प्रेमी आखिर क्यों सहगल की इतनी सराहना किया करते थे. कहते हैं, फिल्मक्राफ़्ट के प्रारंभिक दिनों में गायन, अभिनय, रिकॉर्डिंग व शूटिंग अक़्सर एक साथ किए जाते थे (हालाँकि इस बात का समर्थन करने वाली कोई हाइपरलिंक मुझे इस ब्लॉगपोस्ट को सबमिट करने से पहले नहीं मिली).

बाद के वर्षों में बेहतर कैमरों व रिकॉर्डिंग टेक्नीक्स के चलते अभिनय व गायन में स्वाभाविक परिवर्तन देखे गए, तथा जिन अभिनय व गायन की बारीकियों को दर्ज़ करना पहले संभव नहीं हो सकता था, उन्हें बाद के वर्षों में फ़िल्म-निर्माण का एक सामान्य हिस्सा-सा बना लिया गया. सहगल उसी भीड़ के सामने की जाने वाली नौटंकी व सिनेमाघरों के बड़े-से परदे पर किए जाने वाले बारीक संवेदनाओं के चित्रण के बीच वाले संक्रमण-काल का एक मील का पत्थर माने जा सकते हैं. वे उस पीढ़ी के गायकों व कलाकारों का प्रतिनिधित्व करते हैं, कि जिन्होनें बाद के हिंदी तथा भारतीय सिनेमा को बोलना, रोना, हँसना और गाना सिखाया.

अपने 42 वर्ष को छोटे-से जीवन-काल में कुंदन लाल सहगल ने हिंदी तथा दूसरी भाषाओं की 36 फ़िल्मों में अभिनय किया और 185 फ़िल्मी व ग़ैर-फ़िल्मी गीत व भजन गाए. लेकिन इस थोड़े से समय के दौरान ही उन्होंने न सिर्फ़ हिंदी एवं भारतीय सिनेमा के पहले बड़े सितारे के रूप में अपनी एक अमिट पहचान बना ली, अपितु आने वाली पीढ़ीयों के कलाकारों के वे प्रेरणास्रोत भी बन बैठे. रफ़ी, मुकेश, किशोर, लता, आशा और मन्नाडे सरीखे गायकों के ज़माने में भी रेडियो तथा बाद में टेलीविज़न के माध्यम से सहगल के गाए हुए गीत अक़्सर संगीत-प्रेमियों के कानों में गूँजा करते थे.

ख़ुद मैं सहगल का “जब दिल ही टूट गया ” बतौर संगीत-प्रेमी अपने प्रारंभिक दिनों में अक़्सर गुनगुनाया करता था. हालाँकि इसमें उस ज़माने के अलहदा गायन की नक़ल करना बड़ा मक़सद होता, बनिस्बत उसकी कलात्मकता को सराहने के. लेकिन जब मैं आज लौट कर उसी गाने की समीक्षा उसके सामयिक परिप्रेक्ष्य को ध्यान में रखते हुए करता हूँ, तो सहगल के भारतीय सिनेमा में दिए गए महत्वपूर्ण योगदान की प्रशंसा किए बिना नहीं रह पाता.

भारतीय सिनेमा के इस पहले सितारे को समझने के लिए उनके यूट्यूब पर अपलोड किए गए गीतों के बारे में की गई कमेंट्स पर जा कर ग़ौर करें. वहाँ दिखाई पड़ेगा कि कैसे नाती-पोते आज भी अपने दादा-दादियों के नॉस्टैल्जिया को सँजो कर रखने का प्रयास कर रहे हैं. सहगल के विषय में कुछ और रोचक जानकारियाँ इस वेबपेज़ पर पाई जा सकती हैं.

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