क्यूँ अजीब लगते हैं पुरानी फिल्मों के संवाद एवं गीत?

(Why did old Hindi songs and dialogues sound so peculiar? What were the compelling reasons for their strange sounding oratory? A brief talk about this in Hindi.)

सत्तर तथा अस्सी के दशक में जब भारतीय सिनेमा उद्योग में आर्ट फिल्मों से ले कर मसाला मूवीज तथा बिछड़े हुए भाईयों से ले कर जिंदगी की सच्चाईयों का आईना दिखलाने की होड़ चल रही थी, तब बीते हुए ज़माने की फिल्मों का टीवी प्रसारण देखते हुए उन दिनों मेरे जैसा सिने दर्शक कभी तो कौतूहल का शिकार होता, और कभी उसे हँसी आने लगती. उन फिल्मों की संवाद शैली तथा गायिकी ही कुछ ऐसे कुछ हुआ करते थे, कि कौतूहल होना स्वाभाविक था. बचपन के उस दौर में न तो फिल्म-क्राफ्ट या उससे जुड़ी कला को समझ पाने का वैचारिक सामर्थ्य ही था, और न ही उसके द्वारा सिने उद्योग को दिए गए योगदान को सराह सकने की कोई क्षमता.

उम्र बढ़ने के साथ इस परिस्थिति में, हालाँकि, एक भारी बदलाव दिखने को प्राप्त हुआ, तथा उस ‘अजीबो-गरीब’ सिनेमा को न सिर्फ पहली बार मैं समझ पाने बल्कि उसके जानेमाने चेहरों को सराहने में भी समर्थ हुआ. जरा कल्पना कीजिए उस दौर के विषय में, कि जब बोलने वाली फिल्मों का अभी सिनेमा घरों में पदार्पण होना प्रारंभ ही हो रहा था, तथा उस जमाने की प्रचलित अभिनय विधाओं व भारत जैसे एक परतंत्र राष्ट्र के सिने उद्योग को मिलने वाली सीमित तकनीकी सुविधाओं के बारे में भी. क्योंकि ये दोनों ही फिल्म निर्माण को सबसे अधिक प्रभावित कर सकने वाले परिबल माने जा सकते हैं.

उस दौर में न तो अभिनय की बारीकियों को चिन्हित कर सकने वाले कैमरे ही मौजूद थे, और न ही उस बारीकी को अभिव्यक्त कर पाने वाली अभिनय की कोई विधा ही. जो था वो बस नाट्यगृहों या जलसों में किया जाने वाला वही पुराना पारंपरिक अभिनय, कि जिसमें हर बात या हर भाव को दर्शक दीर्घा की अंतिम श्रेणी तक पहुँचाने की मंशा से बढ़ा-चढ़ा कर किया जाता था, तथा  1930  एवं  40  के  शुरुआती दौर में उपलब्ध होने वाले कैमरों तथा माइक्रोफोन्स  का सीमित तकनीकी सहयोग. असल में उस समय की सिने तकनीक मंच पर किए जाने वाले अभिनय के लिए ही, एक तरह से, अधिक माकूल दिखाई देती थी.

नतीजतन,  हमें उस दौर में आवाज को असाधारण बदलाव के साथ बोलने तथा गाने वाले ऐसे कलाकारों की बहुतायत दिखाई देती है, कि जिनका एकमात्र उद्देश्य अपने हर भाव, हर वाक्य को एक सधे हुए अंदाज में उस जमाने की सेल्यूलॉइड पट्टियों पर अंकित करवाना रहा होगा. तथा यह बात सिर्फ भारतीय सिनेमा तक ही सीमित नहीं दिखाई देती, बल्कि पश्चिमी फिल्मों के शुरुआती दौर में भी कुछ ऐसी ही असामान्य अभिनय विधा वहाँ के दर्शकों को भी अनुभव होती आई है.

हालाँकि समय के साथ आवाज या अभिनय के उस असाधारण परिवर्तन को तकनीकी रूप से बेहतर सिने यंत्र अनावश्यक बनाते गए, तथा उसके बाद आज की अधिक सामान्य लगने वाली अभिनय विधा का अंततोगत्वा पदार्पण हुआ होगा, ऐसा कहा जा  सकता है. फिल्मों के उस ‘अजीब-से’ दौर का सही आकलन करने के पश्चात् उनकी गायिकी, अभिनय, कथाओं एवं निर्माण को ले कर हमारे भीतर एक सम्मान का भाव पैदा होना स्वाभाविक हो जाता है.

माना जाता है, कि टॉकीज के शुरुआती दौर में शूटिंग तथा संवादों व गीतों का दर्जीकरण एक साथ ही करवाया जाता था. यह बात केएल सहगल सरीखे उस दौर के दिग्गज कलाकारों की प्रतिभा का एक परिचायक है. केएल सहगल की गायिकी का अंदाज आज के संगीत श्रोताओं को भले ही अजीबो-गरीब लगे, किंतु उसकी गहराई का प्रमाण इसी एक बात पर से लगाया जा सकता है, कि मुकेश, किशोर कुमार तथा लता मंगेशकर जैसे महान पार्श्वगायकों के पसंदीदा फनकार केएल सहगल हुआ करते थे. सहगल के संवाद तथा गानों की शैली चाहे कैसी भी रही हो, लेकिन उनकी आवाज की गहराई से इंकार करना आज भी हमारे लिए असंभव होगा.

मेरा अगला ब्लॉग केएल सहगल को ही समर्पित रहेगा.

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